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बुधवार, 8 दिसंबर 2010

आज का सद़विचार '' मधुर स्‍त्रोत ''

पाषाण के भीतर भी मधुर स्‍त्रोत होते हैं,
उसमें मदिरा नहीं शीतल जल की धारा
बहती है ....।

- जयशंकर प्रसाद

3 टिप्‍पणियां:

  1. लौहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल। पंक्तियां याद आ गयी। बहुत अच्‍छे विचार।

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  2. तब तो इंसान के भीतर भी कुछ होगा भरोसा किया जा सकता है !

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