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गुरुवार, 25 जून 2009

आज का सद़विचार 'संभालना इन्‍हें'

कांच का कटोरा, नेत्रों का जन, मोती और मन यह,
एक बार टूटने पर पहले जैसी स्थिति नहीं होती,
अत: पहले से ही सावधानी बरतनी चाहिए ।

- लोकोक्ति

1 टिप्पणी:

  1. कितनी अर्थपूर्ण बात है। इन्ही भावों को रहीम खानखाना के इस दोहे ने भी समझाया है
    " रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटिकाय
    टूटे से फिरि ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ि जाय ॥

    अच्छी पोस्ट।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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